शायद फर्राटेदार तमिल बोलें योगी, दिवंगत नेता करें प्रचार... चुनाव में AI क्या बदलने वाला है?

शायद फर्राटेदार तमिल बोलें योगी, दिवंगत नेता करें प्रचार… चुनाव में AI क्या बदलने वाला है?


Deepfake Campaign: डीपफेक के बारे में शायद आपने निगेटव बातें ही सुनी हों लेकिन इसका सकारात्मक इस्तेमाल भी हो सकता है. संभव है लोकसभा चुनाव 2024 में इसका इस्तेमाल हम देख पाएं. यह न सिर्फ कैंपेन का तरीका बदलेगा बल्कि स्टार कैंपेनर अलग-अलग भाषा में प्रभावी तरीके से जनता से जुड़ सकेंगे.

AI Generated Election Video: जरा सोचिए महात्मा गांधी आज के समय में कांग्रेस के लिए कैंपेन करें. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ वर्चुअल मीटिंग में फर्राटेदार उड़िया या तमिल बोलते सुने जाएं. ममता बनर्जी वोटरों को उनके नाम से पुकारें और अपनी सरकार के काम पर फीडबैक मांगें. आप कहेंगे ये तो काल्पनिक बातें हैं मतलब फैंटेसी. जी नहीं, आज AI वर्ल्ड ने इसे रियल बना दिया है. इसके लिए बस आपको सोचना है और AI का डीपफेक अपना कमाल दिखाएगा. हो सकता है कुछ लोगों को यह अच्छा न लगे, वे आलोचना करें लेकिन नेता और AI टेक कंपनियां इस दिशा में काम करने लगी हैं.

जी हां, चेन्नई की एआई फर्म Muonium ने जनवरी में करुणानिधि का डीपफेक वीडियो तैयार किया था. डार्क ग्लास पहने, पीली शॉल में वह उसी अंदाज में दिखाई देते हैं जैसा वह कुछ साल पहले अपने काडर को संबोधित करते दिखाई देते थे. 2018 में उनका निधन हो चुका है. उन्हें देख पार्टी वर्करों में खुशी की लहर दौड़ गई. इस पर तमाम नेताओं की नजर गई है. वीडियो तैयार करने वाले सेंथिल नयागम ने TOI को बताया है कि तमाम कैंडिडेट्स काफी पूछताछ कर रहे हैं.

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पाकिस्तान में हुआ प्रयोग

वैसे, भारत में लोकसभा चुनाव में इसके इस्तेमाल की बातें हो रही हैं लेकिन पाकिस्तान के चुनाव में यह प्रयोग हो भी चुका है. वहां पूर्व पीएम इमरान खान जेल में बंद हैं लेकिन उनकी पार्टी ने डीपफेक वीडियो तैयार कराकर प्रचार किया. अमेरिकी स्टार्टअप इलेवनलैब्स ने खान की आवाज का क्लोन तैयार किया था. इसके लिए उनकी पहले की स्पीच का सहारा लिया गया. नतीजा जानकर आप हैरान रह जाएंगे. पाकिस्तान में इंटरनेट पर बैन होने के बावजूद 45 लाख से भी ज्यादा लोगों ने उस वीडियो को देखा.

लोकसभा चुनाव में होगा इस्तेमाल?

इंडियन डीप फेकर के संस्थापक दिव्येंद्र सिंह कई राजनीतिक दलों और निजी लोगों के लिए चार प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं. ये सब तैयारी लोकसभा चुनाव के लिए है. उन्होंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को बताया कि हमें एक महीने में ही 200 क्वेरी की गई है. एक पॉलिटकल कंसल्टेंट पूर्वोत्तर के नेताओं के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने दावा किया कि डीपफेक लोकसभा चुनाव 2024 में प्रचार के तरीके को पूरी तरह बदल देगा.

वास्तव में डीपफेक वीडियो तैयार करना उतना मुश्किल नहीं है, हां इसके लिए तकनीकी समझ जरूरी है. नयागम ने कहा कि उनका करुणानिधि वाला वीडियो कुछ घंटे में ही बन गया था. डीपफेक कंपनियां रियल ऑडियो और वीडियो डेटा का इस्तेमाल कर डिजिटल अवतार तैयार करती हैं.

यह समझना भी जरूरी है कि ये डीपफेक उन वीडियो से बिल्कुल अलग हैं, जो विरोधी नेताओं को बदनाम करने या झूठा प्रचार करने के लिए तैयार कराए जाते हैं. जैसा पिछले साल एमपी चुनाव से पहले हुआ था. तब दो डीपफेक वीडियो के जरिए बीजेपी और कांग्रेस को निशाना बनाया गया था. इस पर FIR, जांच, गिरफ्तारी और स्पष्टीकरण भी आया था.

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पड़ोसी बांग्लादेश में भी डीपफेक का इस्तेमाल हो चुका है. विपक्षी बीएनपी के नेता तारिक रहमान का डीपफेक वीडियो फेसबुक पर पोस्ट किया गया था. इसमें वह कहते सुने गए कि अमेरिका को खुश रखने के लिए उनकी पार्टी को गाजा पर चुपचाप रहना चाहिए. वैसे AI की मदद से डीपफेक वीडियो 2020 से ही आ रहे हैं लेकिन समय के साथ अब यह ज्यादा क्लियर हो गया है. पहले इसे खतरनाक माना गया लेकिन इसका सकारात्मक इस्तेमाल कमाल का है.

डीपफेक से चुनाव प्रचार के फायदे

1. करुणानिधि का डीपफेक वीडियो एक अच्छा उदाहरण है कि पार्टियां कैसे अपने दिवंगत नेताओं का इस्तेमाल मौजूदा चुनाव प्रचार में कर सकती हैं. नयागम समझाते हैं कि डीएमके और AIADMK के पहले के नेताओं का व्यक्तित्व करिश्माई रहा है. वे जानते थे कि भीड़ को अपने साथ कैसे जोड़ना है, अब उनकी पार्टियां वो जादू फिर से तैयार करना चाहती हैं. इसका फायदा यह होगा कि बुजुर्ग वोटर सीधे कनेक्ट होंगे और युवा जोश में आएंगे.

2. दरअसल, किसी भी पार्टी के पास स्टार प्रचारकों की सीमित संख्या होती है. वे झटपट यहां वहां नहीं पहुंच सकते. उसमें भी अपने देश में भाषा एक बड़ी बाधा है. जैसे सीएम योगी हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा के फायरब्रांड कैंपेनर हैं लेकिन साउथ में वह उतने प्रभावी नहीं हैं. अगर डीपफेक वीडियो में वह साउथ की भाषा बोलते सुने जाएं तो सीन बदल सकता है. ऐसा हर क्षेत्र के हिसाब से हो सकता है. लोकसभा सीट और कम्युनिटी के हिसाब से भाषा और कंटेंट रखा गया तो यह काफी असरदार साबित हो सकता है.

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3. अजमेर से काम करने वाले दिव्येंद्र कहते हैं कि पार्टी कार्यकर्ताओं या अपने चुनाव क्षेत्र को संबोधित करते हुए नेताओं की आवाज के इस्तेमाल वाला AI एजेंट काफी डिमांड में है. टेस्ट के रूप में उन्होंने तमिल, तेलुगू और उड़िया में मैसेज तैयार किया है. उनकी टीम होलोबॉक्स के कॉन्सेप्ट पर भी काम कर रही है, जिसमें किसी नेता का डिजिटल अवतार तैयार किया जाता है. इस तरह से AI रूप में नेता पब्लिक से ज्यादा अच्छी तरह से इंटरैक्ट कर सकेंगे और यह पहले वाले होलोग्राम अवतार से कहीं ज्यादा रियल अनुभव देगा.

सब तो ठीक, खर्चा कितना है

यह सस्ता बिल्कुल भी नहीं है. अच्छी क्वालिटी का वीडियो तैयार कराने के लिए एक मिनट के एक लाख रुपये देने पड़ सकते हैं. ऑडियो-वीडियो मिक्स होने पर खर्च 5 लाख रुपये प्रति मिनट पहुंच सकता है.


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