पीएम मोदी ने सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल बचाने, वर्क फ्रॉम होम करने-जैसी कई अपीलें की हैं. कांग्रेस के नेता इसको लेकर प्रधानमंत्री को घेर ही रहे थे कि भाजपा ने 2013 का मनमोहन सिंह का एक वीडियो ढूंढ निकाला.

पीएम की अपील पर बरस रही थी कांग्रेस, गोल्ड-पेट्रोल पर मनमोहन सिंह का वीडियो निकाल लाई भाजपा


पीएम मोदी ने सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल बचाने, वर्क फ्रॉम होम करने-जैसी कई अपीलें की हैं. कांग्रेस के नेता इसको लेकर प्रधानमंत्री को घेर ही रहे थे कि भाजपा ने 2013 का मनमोहन सिंह का एक वीडियो ढूंढ निकाला.

हमें सोने के प्रति अपनी ललक (इच्छा) को कम करने और पेट्रोलियम उत्पादों के इस्तेमाल में किफायत बरतने (बचत करने) की जरूरत है… यह बात तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कही थी. वो तारीख थी 30 अगस्त 2013, संसद में प्रधानमंत्री बोल रहे थे. 51 सेकेंड का वीडियो भाजपा ने ढूंढकर कांग्रेस पर पलटवार किया है. दरअसल, जबसे पीएम मोदी ने एक साल तक सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल और डीजल का कम से कम इस्तेमाल करने की अपील की है, विपक्ष खासतौर से कांग्रेस हमलावर है.

भाजपा नेता अमित मालवीय ने वीडियो शेयर करते हुए कांग्रेस पर हमला बोला. उन्होंने लिखा, ‘राहुल गांधी और कांग्रेस को सीमित उपयोग या आर्थिक संयम पर लेक्चर देने की जरूरत नहीं है. उन्हें बस सोनिया गांधी (जो उस समय असंवैधानिक NAC की अध्यक्ष थीं) पी. चिदंबरम, वीरप्पा मोइली, और UPA के बाकी गुट को याद दिलाना है कि कैसे भारत को सोने की खरीद पर पाबंदियों और ईंधन की कीमतों पर मनमाने नियंत्रणों की ओर धकेला गया था. ऐसा किसी वैश्विक आश्चर्यजनक घटना के कारण नहीं, बल्कि पूरी तरह से आर्थिक कुप्रबंधन के कारण हुआ था.

कांग्रेस पीएम की अपीलों का मजाक उड़ाती है…

आगे मालवीय ने 30 अगस्त, 2013 का तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बयान शेयर किया है. भाजपा के आईटी सेल के प्रभारी ने आरोप लगाया कि आज कांग्रेस वैश्विक अस्थिरता, आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों और युद्ध के कारण बढ़ी महंगाई के दौर में जिम्मेदारी से उपभोग करने की अपीलों का मजाक उड़ाती है, लेकिन UPA शासन के दौरान, भारतीयों को पाबंदियों और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था क्योंकि वर्षों की नीतिगत जड़ता, भ्रष्टाचार और मनमाने शासन के बाद सरकार के पास कोई विकल्प ही नहीं बचा था.

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उन्होंने पीएम की अपील पर कहा कि असाधारण वैश्विक परिस्थितियों के दौरान जिम्मेदार तरीके से राष्ट्रीय भागीदारी की पहल और वर्षों के आर्थिक पतन के बाद हताशा में की जाने वाली ‘आग बुझाने’ जैसी कोशिशों के बीच एक बड़ा अंतर होता है.


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