One Nation One Election: NDA के एजेंडे में 2029 लोकसभा चुनाव के साथ 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव


मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक यह व्यवस्था 2034 में लागू होगी। संसदीय समिति पिछले कुछ समय से राज्यों का दौरा कर रही है और राज्य सरकारों, विधानसभाओं, शिक्षाविदों, कानूनी क्षेत्र से जुड़े लोगों और उद्योग जगत समेत अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर रही है।

संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) जहां ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े विधेयकों पर विचार कर रही है और राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत विभिन्न पक्षों से सलाह-मशविरा कर रही है, वहीं इस बीच, खबर है कि एनडीए उन 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, जहां उसका बहुमत है, पहली बार एक साथ चुनाव कराने के लिए 2034 के बजाय 2029 में कराने पर विचार कर रहा है।

मौजूदा विधेयकों की समय सीमा के मुताबिक, यह व्यवस्था पहली बार 2034 में लागू होनी है। द इंडियन एक्सप्रेस को मिली जानकारी के मुताबिक, इसके लिए एनडीए इन 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही भंग करने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

 

11 राज्यों में अगले दो वर्षों में होने हैं चुनाव

मामले से परिचित एक सूत्र ने बताया कि एनडीए शासित 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में से 11 में अगले दो वर्षों के दौरान, यानी 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं, चार राज्यों – आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा – में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं। इन चारों राज्यों में फिलहाल NDA की सरकार है।

दिसंबर 2024 में गठित संसद की संयुक्त समिति को उन विधेयकों पर विचार करने की जिम्मेदारी दी गई है, जिनके जरिए लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का रास्ता तैयार किया जाना है। मौजूदा प्रस्ताव के मुताबिक यह व्यवस्था 2034 में लागू होगी। समिति पिछले कुछ समय से राज्यों का दौरा कर रही है और राज्य सरकारों, विधानसभाओं, शिक्षाविदों, कानूनी क्षेत्र से जुड़े लोगों और उद्योग जगत समेत अलग-अलग पक्षों से बातचीत कर रही है। उम्मीद है कि समिति इस साल के शीतकालीन सत्र में अपनी रिपोर्ट सौंप देगी।

सूत्र के मुताबिक, अगर एनडीए अगले दो वर्षों के दौरान इन सभी राज्यों में अपनी सरकारें बरकरार रखता है, तो 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं को जनवरी 2029 तक भंग किया जा सकता है। ऐसा संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद की सलाह पर राज्यपाल कर सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 174 (2) (b) राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार देता है। आम तौर पर राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह पर विधानसभा भंग करते हैं। इसके अलावा अगर किसी सरकार का बहुमत खत्म हो जाता है, तब भी विधानसभा भंग की जा सकती है।

See also  यूपी का ‘बदला’ दिल्ली में...मायावती ने यूं गिरा दी थी अटल सरकार!

विधानसभा भंग होने के बाद जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत निर्वाचन आयोग को छह महीने के भीतर चुनाव कराना होता है।

संयुक्त समिति जिन विधेयकों पर विचार कर रही है, उनमें संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 शामिल हैं। इन विधेयकों में प्रावधान किया गया है कि लोकसभा के आम चुनाव के बाद लोकसभा की पहली बैठक के बाद जिन विधानसभाओं का चुनाव होगा, उनका कार्यकाल छोटा किया जा सकेगा, ताकि अगले चुनाव चक्र में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकें। इसका मतलब है कि अगर ये विधेयक पारित हो जाते हैं, तो मौजूदा प्रावधानों के तहत पहली बार एक साथ चुनाव कराने का सबसे शुरुआती समय 2034 होगा।

जब द इंडियन एक्सप्रेस ने समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी से पूछा कि क्या इन विधेयकों में तय समय से पहले भी एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं, तो उन्होंने कहा, “यह NDA के मुख्यमंत्रियों को तय करना है। यह मुद्दा समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।”

खास बात यह है कि बीजेपी के कुछ मुख्यमंत्रियों ने पहले ही ऐसी योजना पर अपनी सहमति जता दी है। संसद की संयुक्त समिति से मुलाकात के बाद कम से कम चार मुख्यमंत्रियों – गोवा, उत्तराखंड, हरियाणा और दिल्ली – ने एक साथ चुनाव कराने के समर्थन में खुलकर बात की है।

दिल्ली का कार्यकाल करीब एक साल कम करना होगा

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने । जुलाई को समिति के साथ हुई बैठक के बाद कहा था कि अगर राष्ट्रीय स्तर पर चुनावों के कार्यक्रम को एक साथ लाने के लिए दिल्ली के विधानसभा कार्यकाल में उचित बदलाव करना पड़ता है, तो दिल्ली सरकार इसे सकारात्मक नजरिए से देखने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्रीय हित में इसकी जरूरत पड़ी तो दिल्ली ऐसा सहयोग देने वाले प्रमुख राज्यों में शामिल हो सकती है। दिल्ली के मामले में इसका मतलब मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल करीब एक साल कम करना होगा।

See also  जब कांग्रेस मुख्यालय के सामने जोर से हूटर बजवाते थे नेता... 24 अकबर रोड का दिलचस्प किस्सा

– अगर एनडीए 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने के लिए समय रहते इन विधानसभाओं को भंग करने का फैसला करता है, तो इसका मतलब होगा कि गोवा, गुजरात, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की विधानसभाओं का कार्यकाल करीब तीन साल कम करना पड़ेगा। इन राज्यों में विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं।

वहीं छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, राजस्थान और त्रिपुरा की विधानसभाओं का कार्यकाल करीब चार साल कम करना पड़ेगा, क्योंकि इन राज्यों में अगले विधानसभा चुनाव 2028 में होने हैं।

दूसरी ओर, जिन विपक्ष शासित राज्यों में 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें पंजाब का चुनाव 2027 में और हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मिजोरम और तेलंगाना के चुनाव 2028 में होने हैं। इसका मतलब यह होगा कि इन राज्यों में अगले विधानसभा चुनाव के बाद जब 2029 में लोकसभा चुनाव होंगे, तब उनकी विधानसभाओं का कार्यकाल करीब तीन से चार साल और बचा होगा।

इस पूरे घटनाक्रम से एनडीए और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है। दोनों पक्षों के बीच पहले से ही परिसीमन के मुद्दे पर तनाव है।

जब कांग्रेस के महासचिव और संचार प्रभारी जयराम रमेश से पूछा गया कि क्या एनडीए के 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेश 2029 के लोकसभा चुनाव के साथ अपने विधानसभा चुनाव कराने के लिए तैयार हो सकते हैं, तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसे अभी एक काल्पनिक स्थिति बताया।

उन्होंने कांग्रेस के पुराने रुख को दोहराते हुए कहा, “कांग्रेस वन नेशन, वन इलेक्शन के खिलाफ है। यह असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और जवाबदेही के खिलाफ है। जेपीसी इस मामले की जांच कर रही है और उसे शीतकालीन सत्र तक अपनी रिपोर्ट देनी है। हमारी स्थिति बदलने के लिए अब तक कुछ भी नहीं हुआ है।”

See also  फिल्ममेकर की बेटी से की है इस स्टाइलिश नेता ने शादी, सरोगेसी के जरिए बना पिता

2024 में कांग्रेस और डीएमके के सांसदों समेत कई विपक्षी सांसदों ने संसद में ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े विधेयकों को पेश किए जाने का विरोध किया था और इन्हें असंवैधानिक बताया था। मई में जब संयुक्त समिति ने तत्कालीन कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात की थी, तब उन्होंने भी इन विधेयकों का विरोध किया था। अब वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं।

अब तक संयुक्त समिति महाराष्ट्र, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, गोवा और उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुकी है और वहां के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से बातचीत कर चुकी है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) देश की किसी भी अन्य पार्टी से अलग है- चाहे वह अतीत की हो या वर्तमान की। इसका लक्ष्य केवल जितनी बार संभव हो उतनी बार चुनाव जीतना नहीं है, बल्कि चुनाव जीतना और हमेशा के लिए सत्ता में बने रहना है। इस मायने में भाजपा चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के समान है। सीपीसी ने जापानी आक्रमणकारियों के खिलाफ एक भीषण युद्ध और वर्ष 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद 1949 में कुओमिंतांग (केएमटी) के खिलाफ गृहयुद्ध के माध्यम से सत्ता हासिल की। सीपीसी तब – से सत्ता में बनी हुई है।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *