हफ्ते भर में कंप्लीट हुआ था तीसरा आम चुनाव, संसद में कांग्रेस का घटा कद, कनॉट प्लेस में बोर्ड पर दिखाए नतीजे
General Election 1962 Story: देश में पहले और दूसरे आम चुनाव में लगने वाले महीनों के मुकाबले तीसरा लोकसभा चुनाव महज एक हफ्ते में पूरा हो गया था. भारत में 1962 के आम चुनाव में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की चमक फीकी पड़ने की शुरुआत हो गई थी.
Lok Sabha Election News: भारत में राजनीतिक बदलाव की शुरुआत के लिए तीसरा आम चुनाव मील का पत्थर साबित हुआ है. पहले आम चुनाव 1952 में लगे चार महीने और दूसरे आम चुनाव 1957 में लगे तीन महीने के वक्त के मुकाबले में तीसरा आम चुनाव 1962 महज एक हफ्ते में ही कंप्लीट हो गया था. 19 फरवरी से 25 फरवरी 1962 के बीच तीसरा आम चुनाव पूरा कर लिया गया था. इस चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता की हैट्रिक तो लगा ली, लेकिन संसद में न सिर्फ उसका कद घटा, बल्कि लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बावजूद जवाहर लाल नेहरू की चमक भी फीकी पड़ने लगी.
कांग्रेस जीती पर कद घटा, कनॉट प्लेस में बोर्ड लगाकर दिखाए गए नतीजे
देश के सभी 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुए चुनाव के नतीजे को राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस में बड़ा सा ब्लैक बोर्ड लगाकर दिखाया गया था. चुनाव नतीजे के मुताबिक कांग्रेस ने कुल 494 सीटों में से 361 सीटें हासिल की. जबकि पहले आम चुनाव में कांग्रेस के खाते में 364 सीटें आई थीं और दूसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 371 सीटें जीती थीं. कांग्रेस का वोट शेयर भी पहले आम चुनाव में 45 फीसदी और दूसरे आम चुनाव में 48 फीसदी से ज्यादा से घटकर तीसरे आम चुनाव में 44.72 फीसदी रह गया था. तीसरी लोकसभा में 70 फीसदी से ज्यादा सांसद होने के बावजूद कांग्रेस का कद कम हो गया था.
मूंदरा कांड का पर्दाफाश, इंदिरा गांधी बनीं कांग्रेस अध्यक्ष, वंशवाद का आरोप
कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे और प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चमक भी कम पड़ने लगी थी. सेहत के मोर्चे पर दिक्कतों के अलावा सरकार पर लगे घोटाले के दाग ने भी उन्हें परेशान कर दिया था. दूसरे आम चुनाव के तुरंत बाद 1957-58 में नेहरू की नाराजगी के बावजूद उनके दामाद फिरोज गांधी ने मूंदरा कांड को संसद में बहुत शिद्दत से उठाया. मूंदरा कांड के खुलासे के चलते नेहरू सरकार के वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ गया था. वहीं, 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने को लेकर नेहरू पर वंशवाद के आरोप भी लगने लगे थे.
नंबूदरीपाद सरकार की बर्खास्तगी, स्वतंत्र पार्टी का गठन और चीन का हमला
साल 1960 में दिल के दौरे से फिरोज गांधी की मौत से पहले 1959 में इंदिरा गांधी के दबाव में केरल की चुनी हुई ईएमएस नंबूदरीपाद सरकार को बर्खास्त करने के फैसले से भी पीएम नेहरू बुरी तरह घिरे. इसी साल जवाहरलाल नेहरू और कांग्रेस के विरोध में सी राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की. नेहरू की समाजवादी नीतियों के विरोध में उदारवादी-रुढ़िवादी स्वतंत्र पार्टी बनाकर राजगोपालाचारी ने लोकसभा चुनाव 1962 में 18 सीटें जीत ली. पंडित नेहरू के लिए कुछ महीने के बाद सबसे बड़ा झटका चीन के आक्रमण से लगा. हिंदी-चीनी भाई-भाई के उनके पुराने नारे की वजह से भी उनकी साख पर चोट पहुंची.
सीमा की सुरक्षा को लेकर तैयारियों की उपेक्षा के लिए जवाहरलाल नेहरू सरकार की आलोचना शुरू हो गई. इसके चलते रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन को बर्खास्त कर दिया गया. देश को अमेरिकी सैन्य मदद स्वीकार करनी पड़ी. इसके बाद जवाहर लाल नेहरू का स्वास्थ्य भी खराब हो गया. उन्होंने महीनों तक कश्मीर में अपना इलाज करवाया, लेकिन वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए. दिल का दौरा पड़ने से 27 मई, 1964 को उनका निधन हो गया.
पंडित जवाहर लाल नेहरू के लिए आम चुनाव 1962 उनका आखिरी चुनाव था. उत्तर प्रदेश की फूलपुर लोकसभा सीट से उन्होंने जीत की हैट्रिक लगाई. अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी डॉक्टर राम मनोहर लोहिया के मुकाबले उन्होंने 33 फीसदी से भी ज्यादा वोट हासिल किया. चुनाव नतीजे के बाद जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने और पहले के मुकाबले ज्यादा बड़े विपक्ष का सामना किया. तीसरे आम चुनाव में कांग्रेस और उसकी आंतरिक दरारें भी उजागर हो गईं. इसने मतदाताओं के बीच असंतोष को बढ़ाने और विपक्ष को ताकतवर बनाने में मदद की. कांग्रेस के अलावा चार पार्टियों ने दहाई सीटों का आंकड़ा पार किया था. कांग्रेस के बाद कम्यूनिस्ट पार्टियां 29 सीटों पर जीतने के साथ दूसरे नंबर पर थी.
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