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एक सांसद की बनाई फिल्म में ऐसा क्या था? जिसने इंदिरा के बेटे संजय गांधी को पहुंचा दिया जेल


लोकसभा चुनाव 2024 के समय हम आपके लिए ‘किस्सा कुर्सी का’ सीरीज लेकर आए हैं. रोज आपको लोकसभा चुनाव के रोचक किस्से पढ़ने को मिलते हैं पर शायद आज की पीढ़ी को पता नहीं होगा कि इसी नाम से एक फिल्म भी बनी है. जी हां, बताते हैं कि ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म ने इंदिरा गांधी की सरकार हिला दी थी. इमर्जेंसी के बाद संजय गांधी को इसी फिल्म के कारण जेल भी जाना पड़ा था. कुछ साल पहले जब ‘इंदु सरकार’ फिल्म आई थी तब लोगों को 1975 की वो फिल्म भी याद आ गई थी.

संजय गांधी ने क्या किया था?

दरअसल, संजय गांधी पर आरोप था कि उनके कहने पर ‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म के प्रिंट जला दिए गए थे. यह फिल्म जनता पार्टी के सांसद अमृत नाहटा ने बनाई थी, जो पहले कांग्रेस में ही हुआ करते थे. बताते हैं कि फिल्म की नेगेटिव जब्त कर ली गई थी और बाद में उसे कथित तौर पर जला दिया गया. फिल्म पर बैन लगा दिया गया था.

इस फिल्म में संजय गांधी और उनके करीबियों को टारगेट किया गया था. इसमें शबाना आजमी, उत्पल दत्त जैसे चोटी के कलाकारों ने अभिनय किया था. इसमें दिखाया गया था कि राजनेता बने मनोहर सिंह एक जादुई दवा पीकर अजबोगरीब फैसले लेने लगते हैं.

संजय गांधी को दो साल की जेल

आपातकाल समाप्त हुआ तो शाह कमीशन ने जांच में संजय गांधी को फिल्म के प्रिंट जलाने का दोषी पाया. 1979 में दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने संजय गांधी को दो साल जेल की सजा सुनाई थी. कोर्ट ने पूर्व सूचना प्रसारण मंत्री को भी सजा दी थी. संजय गांधी को तिहाड़ जेल की हवा भी खानी पड़ी थी. हालांकि बाद में फैसला पलट दिया गया.

इस फिल्म को बनाने वाले बाड़मेर के सांसद नाहटा पहले कांग्रेसी ही थे. इमर्जेंसी से नाराज हो गए. ऐसे में अंधेर नगरी के शासक और उसके परिवार के इर्द-गिर्द एक कहानी बुनी. शबाना आजमी गूंगी जनता की भूमिका में थीं. रेहाना सुल्तान इंदिरा गांधी के रोल में थीं.

फिल्म में 51 कट

हां, बताते हैं कि जब फिल्म मंजूरी के लिए आई तो उसमें 51 कट लगाने के आदेश दे दिए गए. बताया जाता है कि संजय गांधी के कहने पर उस समय के सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने ‘किस्सा कुर्सी का’ प्रिंट सेंसर बोर्ड के ऑफिस से गुड़गांव में मारुति फैक्ट्री भेज दिया था. वहीं पर इस फिल्म के प्रिंट जला दिए गए.

दोबारा बनी फिल्म लेकिन…

1978 में जब आपातकाल समाप्त हुआ और जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया तब इस फिल्म को दोबारा बनाया गया. उस चुनाव में इंदिरा और संजय दोनों हार गए थे. आमृत नाहटा इस बार जनता पार्टी के टिकट पर जीते थे. थोड़ी कहानी बदलकर फिल्म फिर से बनाई गई. हालांकि फ्लॉप हो गई.

तब संजय गांधी पर कई तरह के आरोप लगे थे. जबरन नसबंदी, सरकारी काम में दखल, मारुति उद्योग से संबंधित विवाद और कथित तौर पर ज्यादतियों की बातें कहीं गई थीं. बाद में एक दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी.


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