जब कांग्रेस मुख्यालय के सामने जोर से हूटर बजवाते थे नेता… 24 अकबर रोड का दिलचस्प किस्सा
शहरी विकास मंत्रालय के नोटिस के मुताबिक कांग्रेस को 24 अकबर रोड वाला मुख्यालय 28 मार्च तक खाली करना होगा. पहले भी कई बार यह स्थिति आई, जब केंद्र सरकार के मंत्रालय में आए इस बंगले को ख़ाली करने के लिए कहा था. अब कांग्रेस सेवादल के दफ्तर और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार विंसेंट जॉर्ज का दफ्तर भी खाली करने को कहा गया है. कांग्रेस के नेताओं की इस ऑफिस से जुड़ी कई यादें हैं.
प्रधानमंत्री रहते हुए देवेगौड़ा ने कांग्रेस से एक निश्चित दूरी बनाए रखी. यही उन्हें महंगा भी पड़ा. कांग्रेस में बहुत से लोग थे, जो सरकार से जरा भी खुश नहीं थे. खुद कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी की यह स्थिति थी कि वे कई मामलों में सरकार को दबाना चाहते थे और अक्सर प्रधानमंत्री से खुन्नस खाए रहते. उन्हें तो इस सरकार के मंत्रियों को आवंटित गाड़ियों के हूटर सायरन तक से दिक्कत थी.

मार्च 1997 में जल्दबाजी दिखाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चा गठबंधन पर दबाव डाला कि वे अपना प्रधानमंत्री बदल डालें. नतीजतन, देवेगौड़ा की जगह इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया गया. केसरी की यह जिद देख बहस शुरू हो गई कि क्या एक राजनीतिक पार्टी को इसका अधिकार है कि किसी दूसरे संगठन के आंतरिक मामलों में इस तरह दखल दे?
24 अकबर रोड से तरबूज तक
देवेगौड़ा को जब इस तरह हटाया जा रहा था, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नरसिम्हा राव दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग स्थित अपने आवास पर निष्क्रिय बैठे हुए थे. 30 मार्च 1997 को जब बजट सत्र चल रहा था, सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चा सरकार से समर्थन वापस ले लिया.
अगले दिन दोपहर के भोज में दो मित्र- नरसिम्हा राव और अटल बिहारी वाजपेयी एक ही टेबल पर थे. इस भोज में मीठे के तौर पर तरबूज पेश किया गया था. वाजपेयी उस समय लोकसभा में विपक्ष के नेता थे. उन्होंने ‘तरबूज’ को ‘खट्टा’ बताते हुए आश्चर्य व्यक्त किया कि सीजन न होने के बावजूद इस दावत में तरबूज क्यों खिलाया गया. राव ने व्यंग्य में कहा, ‘जब हम बजट सत्र के दौरान समर्थन वापस ले सकते हैं तो ऑफ सीजन में तरबूज क्यों नहीं पेश कर सकते?’
‘हाथी… नहीं हाथ’ इंदिरा गांधी को सुनाई नहीं दे रहा था
कांग्रेस दो हिस्से में बंट चुकी थी. इंदिरा के साथ जो कांग्रेसी रहे, उसे कांग्रेस (आई) कहा जाने लगा. रेड्डी की पार्टी कांग्रेस (आर) हो गई. लोकसभा में कांग्रेस के 153 सांसदों में से 76 इंदिरा की उस पार्टी में आ गए, जिसका अभी कोई कार्यालय तक नहीं था. यही नहीं, इस आपसी विवाद में पार्टी का चिह्न गाय-बछड़ा भी दोनों के हाथ से जाता रहा.
कहा तो यह जाता है कि इंदिरा ने खुद भी गाय-बछड़े को जाने दिया क्योंकि इसे पूरे देश में अलग तरह से प्रचारित कर दिया गया था. इस दुष्प्रचार के मुताबिक कांग्रेस के चुनाव चिह्न में गाय इंदिरा थीं और बछड़ा संजय गांधी. गाय-बछड़े से मुक्ति पाने के बाद इंदिरा ने चुनाव आयोग से पार्टी के पुराने चुनाव चिह्न दो बैलों की जोड़ी के लिए गुहार लगाई लेकिन आयोग ने तब वह चुनाव चिह्न स्थगित कर दिया था. 
उन्हीं दिनों इंदिरा गांधी पीवी नरसिम्हा राव के साथ विजयवाड़ा के दौरे पर थीं. 24 अकबर रोड स्थित इंदिरा गांधी का निवास स्थल कांग्रेस कार्यालय के रूप में भी काम आ रहा था. कार्यालय का कामकाज देख रहे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बूटा सिंह ने चुनाव आयोग में पार्टी चिह्न के लिए आवेदन दिया.
आयोग ने तत्काल ही उनके सामने हाथी, साइकिल और पंजे के रूप में तीन विकल्प रख दिए. इस पर असमंजस में पड़े बूटा सिंह ने इंदिरा गांधी से चुनाव चिह्न के बारे में सहमति लेने के लिए फोन बुक किया. सम्भवतः टेलिफोन लाइन ठीक काम नहीं कर रही थी, शायद कुछ असर बूटा सिंह के लहजे का भी होगा कि इंदिरा गांधी उनकी बात ठीक से समझ नहीं पा रही थीं.
राव थे कई भाषाओं के जानकार और…
बूटा सिंह ‘हाथ’ कह रहे थे उधर, इंदिरा गांधी ‘हाथी’ समझे जा रही थीं. वह इसके लिए बार-बार मना कर रही थीं और बूटा सिंह उन्हें निरंतर समझाने की कोशिश में लगे थे कि वे हाथी की नहीं, ‘हाथ’ की बात कर रहे हैं. तंग आकर इंदिरा ने फोन राव को थमा दिया. एक दर्जन से ज्यादा भाषाओं के जानकार राव तुरंत समझ गए कि बूटा सिंह क्या कह रहे हैं. उन्होंने इसे और स्पष्ट करने के लिए तेज आवाज में बूटा सिंह से कहा, यह कहो न पंजा है. इतना सुनते ही इंदिरा ने चैन की सांस ली और फोन वापस लेकर हाथ के पंजे पर तुरंत अपनी सहमति दे दी.
जब तीन दिन रोशन रहा 24 अकबर रोड
राजीव गांधी की तब प्रचंड जीत हुई थी. चुनाव में कांग्रेस को लोकसभा की 543 सीटों में से 415 पर जीत हासिल हुई. यह वह संख्या थी, जहां तक राजीव की मां इंदिरा गांधी, नाना जवाहरलाल नेहरू भी नहीं पहुंच पाए थे. इंदिरा की निर्मम हत्या से मिली सहानुभूति के साथ ही यह राजीव द्वारा की गई मेहनत की भी जीत थी. चुनाव प्रचार के 25 दिनों में उन्होंने कार, हेलिकॉप्टर और प्लेन से 50 हजार किलोमीटर से ज्यादा की यात्राएं की थीं. चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद इस तरह की बातें भी कही जाने लगीं कि राजीव और आरएसएस के तत्कालीन मुखिया बाला साहब देवरस के बीच गुप्त बैठक हुई थी और संघ ने अपने राजनीतिक संगठन भाजपा के होते हुए भी 1984 के इस चुनाव में कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया.
हालांकि भाजपा अब राजीव गांधी की कांग्रेस के साथ आरएसएस के किसी भी समझौते का खंडन करती है. पहली और शायद आखिरी बार भी 24, अकबर रोड दिल्ली स्थित ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी मुख्यालय महाविजय की इस खुशी में तीन दिन तक रोशनी से जगमगाता रहा. अब कांग्रेस के नए मुख्यालय की तस्वीर देखिए, जिसका उद्घाटन पिछले साल हुआ.
(रशीद किदवई की किताब ‘भारत के प्रधानमंत्री’ से साभार)
कांग्रेस मुख्यालय का नया पता यह है
AICC Hq, Indira Bhawan, 9A Kotla Marg, New Delhi – 110002


